1920 से हिंदी सिनेमा की अभिनेत्रियाँ: जन्म तिथि और यादगार फिल्में [ part- 1]
1920 से हिंदी सिनेमा की अभिनेत्रियाँ: जन्म तिथि और यादगार फिल्में
1920 से 1967 के दौर के बीच हिन्दी सिनेमा पर राज करने वाली प्रमुख अदाकाराओं की जन्म तिथियों और उनकी यादगार फ़िल्मों की जानकारी पर नज़र डालेंगे। ये वही अदाकाराओं के नाम है, जिनकी अदायगी आज भी भारतीय फ़िल्मों के इतिहास में मिसाल मानी जाती है और जिनका प्रभाव आनेवाली पीढ़ियों की अभिनेत्रियों पर साफ़ दिखाई दे रहा है।1930 से 1967 का दौर हिन्दी सिनेमा का वह स्वर्णिम अध्याय रहा है, जब अभिनय सिर्फ़ चेहरा नहीं बल्कि भावनाओं की भाषा हुआ करता था। इस कालखंड की अभिनेत्रियों ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने अभिनय, सौम्यता और सशक्त किरदारों से भारतीय सिनेमा की नींव मज़बूत की।
हिन्दी सिनेमा का प्रारंभिक दौर:—
हिन्दी सिनेमा के प्रारम्भिक दौर 1920 में अभिनेत्रियाँ मुख्य रूप से मूक फ़िल्मों से जुड़ी थी, जिनमे विदेशी मूल की पैशन्स कूपर और भारतीय अभिनेत्री फातिमा बेगम प्रमुख थी।
एंग्लो इंडियन अभिनेत्री पैशन्स कूपर और फातिमा बेगम1920 से 1930 तक
पैशन्स कूपर:—
पैशन्स कूपर एक एंग्लो-इंडियन अभिनेत्री थी और ब्रिटिश भारत में हिन्दी सिनेमा की शुरुआती मूक फ़िल्मों की सूपस्टार माना जाता था। उस दौर में उन्हे मूक युग की सायरन, डांसइंग स्टार और सिलेन्ट स्क्रीन स्टार के नाम से भी जाना जाता था।
उनका जन्म 30 मई 1905 में बेंगाल प्रेज़िडन्सी के कलकत्ता के हावड़ा में हुआ था। पैशन्स कूपर ने फ़िल्म "दमयंती" [1920] में फ़िल्मों में डेब्यू किया था। उन्हे भारतीय हिन्दी सिनेमा में पहली बार दोहरी भूमिका निभाने का श्रेय दिया जाता है।
पैशन्स कूपर ने फ़िल्म "पत्नी प्रताप" में जुड़वां बहनों के रूप में और फ़िल्म "कश्मीरी सुंदरी" में माँ और बेटी के रूप में दोहरी भूमिका निभाई है। उनका निधन अपने घर में 88 वर्ष की आयु में 1993 में पाकिस्तान स्थित कराची में हुआ।
फातिमा बेगम :—
फातिमा बेगम एक अग्रणी भारतीय अभिनेत्री थी, जिन्होंने 1922 में प्रदर्शित मूक फ़िल्म "वीर अभिमन्यु" से अपने अभिनय की शुरुआत की थी।
फातिमा बेगम उस दौर में एक बड़ी स्टार बन गई, जब अक्सर पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते थे। बाद में वे भारत की पहली महिला निर्देशक, निर्माता और पटकथा लेखिका बनी।
फातिमा बेगम का जन्म 1892 में उस दौर के ब्रिटिश राज के गुजरात स्थित सूरत जिले में हुआ। उनकी प्रमुख फ़िल्मों में——
" पृथ्वी वल्लभ " [1924] , " काला नाग " [1924] , "सती सरदारबा" [1924] , "राजा हरिश्चंद्र" [1924] , "देवदासी" [1921] , "बुलबुल-ए-परिस्तान" [1926] और "ज़ालिम ज़ुलेखा" [1930] है। निधन—आयु के 91 वे वर्ष में 1983 को गुजरात में हुआ।
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| जुबैदा बेगम और सीता देवी |
ज़ुबैदा बेगम एक भारतीय अभिनेत्री थी। अपने करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने की मूक फ़िल्मों में अभिनय किया। जबकि पहली टॉकी फ़िल्म "आलम आरा" [1913] मे उन्हे सफलता मिली।
उनका जन्म 1911 में भारत के पश्चिमी गुजरात में सूरत शहर में सचिन रियासत के नवाब सिद्दी इब्राहीम मुहम्मद याकूत खान के घर हुआ। जुबैदा बेगम का वास्तविक नाम जुबैदा बेगम धनराजगिर था।
जुबैदा बेगम ने जब कोहिनूर में अभिनय का करियर आरंभ किया तब उनकी आयु मात्र 12 वर्ष की थी, यह एक मूक फ़िल्म थी।
उनकी प्रमुख फ़िल्मों में "काला चोर" [1925] , "" गुल-ए-बकावली "[1924] ," "देवदासी [1925] ," "रंभा ऑफ राजनगर" [1925] , "" इंद्रसभा "[1925] , और" देशन दुश्मन " [1925] आदि।
जुबैदा बेगम ने अपने अंतिम वर्ष 1987 में परिवार के बॉम्बे महल, धनराज महल में बिताए। 21 सितम्बर 1988 को 77 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हुआ। जुबैदा को दक्षिण मुंबई के छत्रपती शिवाजी महाराज मार्ग के अपोलो बन्दर कोलाबा में दफनाया गया।
सीता देवी : ---
सीता देवी हिन्दी सिनेमा के मूक फ़िल्मों की एक प्रमुख अभिनेत्री थी। उन्हें फ़िल्म उद्योग की मूक फ़िल्मों की शुरूआती स्टार्स में से एक माना जाता था।
सीता देवी की फ़िल्में यूरोप में बहुत लोकप्रिय थी, उनके जर्मनी, पोलैंड, इंग्लैंड, जर्मनी और ऑस्ट्रिया में काफ़ी संख्या में प्रशंसक थे। उन्हें इर्मेलिने, रूबी मायेर्स, सबिता देवी और पैशन्स कूपरके साथ 1920-30 के दशक की प्रमुख स्टार के रूप में श्रेय दिया जाता था।
सीता देवी का जन्म एक एंग्लो-इंडियन परिवार में 1912 में बेंगाल प्रेसीडेंसी में हुआ था। उनका वास्तविक नाम रेनी स्मिथ था। उन्हें अपनी पहली फ़िल्म "इंद्रजीत" [1922] , में बाल कलाकार के रूप में काम करने के दौरान हिमांशु राय ने उन्हें 'सीता देवी' का मंच नाम दिया था।
उन्होंने 1925 में फ़िल्म "प्रेम संन्यास" में मुख्य भूमिका दवरा अपना फ़िल्मी करियर शुरू किया। इस फ़िल्म में उन्होंने गोपा का किरदार निभाया था। उनकी यह फ़िल्म आंतर-राष्ट्रीयस्तर पर-विशेष रूप यूरोप में बेहद सफल हुई और वे रातोरात स्टार बन गई।
अपने करियर के उत्तरार्ध में 1956 में फ़िल्म "बादल और बिजली" में एक पार्श्वगायिका के रूप अपना योगदान दिया था।
उनकी प्रमुख मूक फ़िल्मों में "लाइट ऑफ़ एशिया" [1926] , "सरला" [1928] , "शीराज़" [1928] , "भारांतरि" [1928] , "कपाल कुण्डला" [1929] , "भारत रमणी" [1930] और "कल परिणया" [1930] है। सीता देवी ने अपने साँसे 1983 में 71 वर्ष की आयु में मुंबई में मुंद ली।
1930 का दशक – बोलती फिल्मों का आगमन: -
1931 में एक भारतीय ऐतिहासिक फंतासी फिल्म " आलम आरा ", जिसका निर्देशन और निर्माण अर्देशिर ईरानी ने किया था। इसी फिल्म के साथ भारतीय सिनेमा में आवाज़ की शुरुवात हुई और इस दौर की अभिनेत्रियों में देविका रानी, दुर्गा खोटे, कानन देवी और लीला चिटनीस उल्लेखनीय अभिनेत्रियाँ थी।
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| देविका रानी ,दुर्गा खोटे , कानन देवी और लीला चिटनीस |
देविका रानी एक भारतीय अभिनेत्री थी। उन्होंने भारतीय हिन्दी सिनेमा में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। भारतीय हिन्दी सिनेमा में पहली महिला के रूप में व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त की गई थी। उन्हें महानतम अभिनेत्रियों में से एक माना जाता था। देविका रानी ने दादासाहेब फाल्के पुरस्कार प्राप्त किया और 'पद्मश्री' से भी सम्मानित किया गया था।
वे 1930 और 1940 के दशक के आरंभिक वर्षों में सबसे अधिक भुगतान पाने वाली अभिनेत्री थीं। उन्होंने 1940-41 में बॉक्स ऑफिस इंडिया की "शीर्ष अभिनेत्रियों" की सूची में भी शामिल होने का सम्मान प्राप्त किया था।
देविका रानी का जन्म 30 मार्च 1903 को विशाखापत्तनम, मद्रास प्रेसिडेंसी के एक समृद्ध और शिक्षित मनमोहन चौधरी और लीला देवी के बंगाली परिवार में हुआ था। देविका रानी के माता-पिता ने उन्हें नौ वर्ष की आयु में इंग्लैंड के बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया था। वहाँ उन्हें शिक्षा प्राप्त हुई और उन्होंने अपना अभिनय और संगीत का अध्ययन लंदन में रॉयल अकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट और रॉयल अकादमी ऑफ म्यूजिक से किया। उनका 9 मार्च 1994 को कर्नाटक राज्य के बेंगलुरु में ब्रोंचाइटिस के कारण निधन हो गया था।
दुर्गा खोटे अपने समय की अग्रणी भारतीय अभिनेत्रियों में से एक थी। उन्होंने 50 से अधिक वर्षों तक हिंदी और मराठी सिनेमा के आलावा थिएटर में भी काम किया है। दुर्गा खोटे ने करीब 200 फिल्मों और कई थिएटर प्रस्तुतियों में अभिनय किया है।
दुर्गा खोटे का जन्म 14 जनवरी 1905 में गोवा के पांडुरंग श्यामराव लाड और मंजुलाबाई लाड के कोंकणी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम वीटा लाड था।
उन्होंने अपना फ़िल्मी करियर 1931 में वी. शांताराम की प्रभात फिल्म कंपनी की एक सामाजिक मूक फिल्म " फरेबी जाल " में एक छोटी सी भूमिका से की थी। इस फिल्म के पश्चात उन्होंने उसी कंपनी द्वारा निर्मित ऐतिहासिक हिंदी और मराठी श्वेतश्याम फिल्म " माया मछिन्द्र "में काम किया। इसके पश्चात उन्होंने 1932 में प्रदर्शित फिल्म " आयोध्याचा राजा ", जो हिंदी और मराठी दोहरे संस्करण में नायिका की मुख्य भूमिका निभाई थी।
उनकी अन्य प्रमुख फिल्मों में ---
1 ] फिल्म " राजरानी मीरा " [ 1933], 2] फिल्म "सीता" [1934],3] फिल्म "जीवन नाटक" [1935], 4] फिल्म "अमर ज्योति" [1936], 5] फिल्म "प्रतिभा " [1937], 6] फिल्म "साथी" [1938], 7] फिल्म "अधूरी कहानी" [1939], 8] फिल्म "यमला जाट" [1940], 9] फिल्म "चरणों की दासी" [1941],10] फिल्म "भारत मिलाप" [1942], 11] फिल्म "मुगल-ए-आ जम" [1960] और 12] फिल्म "मुझे जीने दो" [1963]
इन फिल्मों के आलावा उनकी और भी अनगिनत फ़िल्में है। दुर्गा खोटे जैसी अभिनेत्री ने हिंदी और मराठी सिनेमा में अनेक यादगार किरदार निभाकर आयु के 86 वर्ष में 22 सितम्बर 1991 को मुंबई के उनके आवास पर ही अपनी आँखे हमेशा हमेशा के लिए मूंद ली ।
कानन देवी भारतीय हिन्दी और बांगला सिनेमा की प्रमुख हस्तियों में
शामिल थी। कानन देवी एक उस ज़माने की सुपरस्टार अभिनेत्री और अच्छी गायिका
भी थी। उन्होंने न्यू थिएटर्स के तहत अनेक हिन्दी और बंगाली फ़िल्मों में
अभिनय किया है।
कानन देवी का जन्म 22 अप्रैल 1916 को पश्चिम बंगाल
स्थित हावड़ा में रतन चंद्र दास और राजोबाला देवी के महिष्य परिवार में हुआ
था। उनका वास्तविक नाम कानन बाला था। कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने
हावड़ा स्थित सेंट अग्नेस कान्वेंट स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा ग्रहण की
थी।
कानन देवी ने एक बाल कलाकार के रूप में फ़िल्मों में क़दम रखा।
उनकी एक शुभचिंतक थी, तुलसी! उन्होंने कानन देवी को मदन थिएटर / ज्योति
स्टूडियो से परिचित कराया था। इस दौरान कानन देवी मात्र दस वर्ष की थी।
1926
में रिलीज़ हुई मूक फ़िल्म "जयदेव" को उनकी प्रारम्भिक फ़िल्मों में माना
जाता है। इसके पश्चात उन्होंने बोलती फ़िल्मों के दौर में कानन देवी ने अपनी
मधुर आवाज़ और प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया।
कानन देवी की कुछ हिन्दी फ़िल्में:——
1 ] " सपेरा " [1939]
2 ] " आंधी " [1940]
3 ] " पराजय " [1939]
4 ] " लगन " [1941]
5 ] " राज लक्ष्मी " [1945]
1930
और 1940 के दशक में वे न्यू थियटर्स स्टूडियो की सबसे लोकप्रिय सितारों
में शामिल हो गई थी। वे केवल अभिनेत्री ही नहीं थी बल्कि हिन्दी और बंगाली
सिनेमा की पहली सुपरस्टार गायिकाओं में भी मानी जाती थी। उनकी फ़िल्मों के
गीत उस दौर में बेहद लोकप्रिय थे। कानन देवी ने भारतीय फ़िल्म संगीत को नई
पहचान दी।
हिन्दी सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें 1976 में
"दादा साहेब फाल्के" पुरस्कार से सन्मानित किया गया। वे पहले ही 1968 में
"पद्मश्री" पुरस्कार से सन्मानित हो चुकी थी। 17 जुलाई 1992 में कानन देवी
का कोलकाता में निधन हो गया। हिन्दी सिनेमा के स्वर्णिम युग का एक
महत्त्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।
लीला चिटनीस को हिन्दी सिनेमा की अग्रणी अभिनेत्रियों में गिना जाता है। उन्होंने 1930 और 1940 के दशक में हिन्दी सिनेमा को एक नई पहचान दी है। लीला चिटनीस अपने सहज अभिनय, सौम्य व्यक्तित्व और भावपूर्ण अभिव्यक्ति के कारण दर्शकों के बीच लोकप्रियता हासिल की थी। उस दौर में फ़िल्मों में महिलाओं का काम करना सहज नहीं माना जाता था, तब लीला चिटनीस ने अपनी मेहनत और प्रतिभा से हिन्दी सिनेमा में सन्मानजनक स्थान बनाया था।
लीला चिटनीस का जन्म 9 सितम्बर 1909 को कर्नाटक के धारवाड़ में एक मराठी भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह बी.ए.की डिग्री के साथ, पहली शिक्षित फ़िल्म अभिनेत्रियों में से एक थी। उन्होंने स्नातक होने के पश्चात "नाटयमनवंतर" जो मराठी में नाटक प्रस्तुत करता था, उससे जुड़ गयी। हिन्दी सिनेमा में उनकी पहली फ़िल्म "इन्साफ" [1937] में प्रदर्शित हुई थी।
लीला चिटनीस की उस दशक की सबसे यादगार और हिट फ़िल्म थी "कंगन" [1939] इस फ़िल्म में उन्होंने एक संघर्षरत महिला की यादगार भूमिका निभाई थी। इस फ़िल्म के जरिये उनकी प्रतिभा को स्वीकार्यता मिली। इस के आलावा उनकी हिट फ़िल्मों में "बंधन" [1940] फ़िल्म को भी शामिल किया जा सकता है, जिसने उनकी अभिनय क्षमता को और भी सुदृढ़ किया था।
1951 के दशक में, ग्रेटशोमैन राजकपूर को फ़िल्म "आवारा" में काम करने का अवसर मिला था। यह फ़िल्म भारत के साथ-साथ विदेशों में भी बहुत प्रशंसा प्राप्त करने में सफल रही थी। उस समय, उन्होंने बड़े नायकों के साथ काम किया और देव आनंद के साथ फ़िल्म "काला बाज़ार" [1960] में उनकी अद्भुत अभिनय की सराहना की गई।
"1940–1950 के दशक की वे अभिनेत्रियाँ जिन्होंने हिंदी सिनेमा की नींव मजबूत की" : ---
1940 और 1950 के दशक को हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग की शुरुआत माना जाता है। इस युग में कई अभिनेत्रियों ने अपनी अद्भुत अभिनय कला, सौंदर्य और प्रसिद्धि से दर्शकों के दिलों को छू लिया। यहाँ उस दशक की प्रमुख अभिनेत्रियाँ है --------
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| नरगिस मधुबाला मीना कुमारी |
नरगिस : ----
नरगिस हिन्दी सिनेमा की बेहतरीन और प्रतिष्ठित अभिनेत्री थी। उन्हें अक्सर 1975 में प्रदर्शित फ़िल्म "मदर इंडिया" के कारण आज भी याद किया जाता है।
नरगिस ने अक्सर हास्यप्रद कॉमेडी से लेकर साहित्यिक नाटकों तक, विभिन्न शैलियों में परिष्कृत और स्वतंत्र महिलाओं की भूमिका निभाई थी। वह 1950 से 1960 के दशक की सबसे अधिक कमाई करनेवाली अभिनेत्रियों में से एक थी।
अभिनेत्री नरगिस का जन्म 1 जून 1929 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में हुआ था। उनका वास्तविक नाम फातिमा राशिद था। फातिमा ने पहली बार 14 वर्ष की आयु में 1935 में प्रदर्शित फ़िल्म "तलाशे हक़" में काम किया था, इस फ़िल्म में उन्हें बेबी नरगिस का नाम दिया गया था।
नरगिस ने 1943 में महबूब खान की फ़िल्म "तक़दीर" से बतौर नायिका के रूप में भूमिका निभाई। इस फ़िल्म के दौरान नरगिस मात्र 14 वर्ष की थी, फ़िल्म के नायक थे उस दौर के अभिनेता मोतीलाल। उनकी यह पहली फ़िल्म बॉक्सऑफिस पर सफल रही थी। इसी फ़िल्म से उनकी लोकप्रियता में इजाफ़ा हुआ।
उनकी कुछ हिट फ़िल्में—-
"बरसात" [1949] , "आधी रात" [1950] , "दीदार" और "आवारा" [1951] , "अनहोनी" [1952] , "पापी" और "आह" [1953] , ' श्री 420 "और" चोरी-चोरी "[1956] ," मदर इंडिया "[1957] ," काला बाज़ार "[1960] और" रात और दिन " [1967] के आलावा और भी कई फ़िल्में है।
मधुबाला : ------
भारतीय हिन्दी सिनेमा की लोकप्रिय और सदाबहार अभिनेत्री मधुबाला को हिन्दी सिनेमा की दुनिया में 'वीनस' के नाम से भी जाना जाता था। 1950 के दशक में मधुबाला हिन्दी सिनेमा की सबसे अधिक कमाई करनेवाली अभिनेत्रियों में से एक थी।
मधुबाला ने अपने दो दशक के लम्बे करियर में 70 से अधिक फ़िल्मों में अपने अभिनय का जलवा बिखेरा है, जिनमे हास्यप्रद कॉमेडी से लेकर ऐतिहासिक नाटक भी शामिल है। उनकी मृत्यु के पश्चात भी वह बॉलीवुड की आइकॉन बनी थी।
मधुबाला का जन्म 14 फरवरी 1933 को दिल्ली में पेशावर घाटी के पश्तूनों के युसुफ़जई कबीले के अताउल्लाह खान और आयशा बेगम के घर हुआ था। मधुबाला का वास्तविक नाम मुमताज जहाँ बेगम देहलवी था। उनके माता-पिता की कुल 11 संताने थी, जिनमे मधुबाला पाँचवी संतान थी।
मधुबाला ने अपना अधिकतर बचपन दिल्ली में ही बिताया। उन्होंने अपने पिता के मार्गदर्शन में उर्दू और पश्तो भाषा सीखी थी। मधुबाला बचपन से ही फ़िल्में देखने की शौकीन थी, वह अक्सर अपनी माँ के सामने अपने पसंदीदा सीन करके दिखाती थी और अपना मनोरंजन करने के लिए नाचने और फ़िल्मी किरदारों कि नक़ल करने में समय बिताती थी।
1940 में उनके पिता की नौकरी चली गई, जिससे परिवार की आमदनी का ज़रिया समाप्त हो गया। पैसे कमाने में सहायता करने 7 वर्ष की मधुबाला ने 'ऑल इंडिया रेडियो' में काम करना आरम्भ किया था, उन्होंने उस समय ख्वाजा खुर्शीद अनवर के गाने गाये।
बॉम्बे टॉकीज के राय बहादुरचुन्नीलाल ने मधुबाला को फ़िल्म "बसंत" में एक छोटी—सी भूमिका के लिए 150 रूपये के वेतन पर साइन किया था। उन्हें इस फ़िल्म में क्रेडिट नहीं मिला परन्तु उन्होंने फ़िल्म के लिए दो गाने भी रिकॉर्ड किये।
निर्देशक केदार शर्मा ने 14 वर्ष की इस अभिनेत्री को क्लासिक फ़िल्म "नीलकमल" [1947] में पहली बार मुख्य भूमिका दी। इस फ़िल्म में लीड रोल में अभिनेता राजकपूर थे।
उनकी लोकप्रिय फ़िल्मों में——"मुग़ल-ए-आज़म" [1960] "," हावड़ा ब्रिज "[1958]" , "मिस्टर एंड मिसेस 55" [1955] "," काला पानी "[1958]" , "बरसात की रात" [1960] "," महल "[1949]" , "हाफ टिकट" [1962] और "चलती का नाम गाडी" [1958] शामिल है।
23 फरवरी 1969 को हिन्दी सिनेमा की इस दिग्गज अभिनेत्री मधुबाला का महज़ 36 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया।
मीना कुमारी : ------
हिंदी सिनेमा में मीना कुमारी को सबसे बेहतरीन और महान अभिनेत्रियों में से एक माना जाता है , इसके आलावा वे ट्रेजेडी क्वीन के नाम से ही हिंदी सिनेमा के इतिहास में मशहूर है। उन्होंने अपने 33 वर्ष के फिल्म करियर में, बाल कलाकार से लेकर वयस्क अभिनेत्री बनने तक 90 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया है।
मीना कुमारी का जन्म 1 अगस्त 1933 को अली बक्श के घर मुंबई में हुआ था। उनका वास्तविक नाम महजबीन था। महजबीन ने 6 वर्ष की आयु में ही बाल कलाकार के रूप में सिनेमा के पर्दे पर प्रवेश किया था।
उनकी किस्मत 1946 में बदल गई उन्हें रमणीक प्रोडक्शन की फिल्म " बच्चों का खेल " में मुख्य भूमिका के लिए साइन किया गया था। इसी फिल्म से उनको दर्शकों ने पसंद करना शुरू किया। मीना कुमारी की चर्चित फिल्म " पाकीज़ा " को कैसे भुलाया जा सकता है।
उनकी फिल्म " पाकीज़ा " के आलावा उनकी अन्य हिट फ़िल्में है ----
" परिणीता " [1953]", " दो भीगा जमीन " [1953]", " आज़ाद " [1955]", " शारदा" [1957]", " दिल अपना और प्रीत पराई " [1960]", " आरती " [1962]", " साहिब बीबी और गुलाम " [1962]", " दिल एक मंदिर "[1963]", और " पाकीज़ा " [1972] के अतिरिक्त कई फ़िल्में है।
31 मार्च 1972 को ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी का लिवर सिरोसिस की बीमारी से मुंबई में निधन हो गया।
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विशेष सूचना:
इस लेख के प्रथम भाग में हमने हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग की अमर अभिनेत्रियों Madhubala और Meena Kumari के जीवन एवं योगदान पर प्रकाश डाला। लेख के अगले भाग में हम Nutan, Vyjayanthimala, Waheeda Rehman और Mala Sinha जैसी महान अभिनेत्रियों के अभिनय-सफर, उपलब्धियों और हिंदी सिनेमा में उनके अमूल्य योगदान पर विस्तार से चर्चा करेंगे। जुड़े रहिए इस विशेष श्रृंखला के अगले भाग के साथ।
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