श्रीदेवी की जीवनी: संघर्ष, सुपरस्टारडम और 15 अनसुनी बातें | Part-1&2
| भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार" श्रीदेवी |
भारतीय सिनेमा के इतिहास में श्रीदेवी एक ऐसा नाम हैं जिन्हें परिचय की आवश्यकता नहीं। महान अभिनेत्रियों की चर्चा में उनका नाम सबसे पहले आता है। वे केवल एक सफल अभिनेत्री नहीं, बल्कि अभिनय, नृत्य, अभिव्यक्ति और बहुमुखी प्रतिभा का संगम थीं, जिन्होंने पाँच दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। उन्हें "भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार" कहा जाता है, जो उनकी लोकप्रियता और उपलब्धियों को दर्शाता है।
आज भी "हवा हवाई", "चांदनी", "नगीना", "मिस्टर इंडिया" या "इंग्लिश विंग्लिश" का नाम लेते ही उनके चेहरे की मुस्कान, आँखों की मासूमियत और अद्भुत अभिनय की झलक याद आ जाती है। उन्होंने साबित किया कि फिल्म की सफलता केवल नायक पर नहीं, बल्कि एक सशक्त अभिनेत्री पर भी निर्भर करती है।
बचपन से ही कैमरे की दुनिया : ---

श्री अय्यप्पन, बीच में श्रीदेवी और उनकी माता श्रीमती राजेश्वरी

13 अगस्त 1963 को तमिलनाडु के शिवकाशी की पावन भूमि पर जन्मीं श्रीदेवी का वास्तविक नाम श्री अम्मा यंगर अय्यप्पन था। उनके पिता, श्री अय्यप्पन, जो पेशे से एक कुशल वकील थे और उनकी माता, श्रीमती राजेश्वरी, जिन्हें कला और संस्कृति से गहरा प्रेम था, की छत्रछाया में, श्रीदेवी ने बहुत ही कम उम्र में अभिनय की दुनिया की ओर अपना क़दम बढ़ाया। शायद उनकी माता की कलात्मक विरासत ही थी जिसने उन्हें इस आकर्षक क्षेत्र की ओर खींचा।
यह बात बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि श्रीदेवी ने महज़ चार वर्ष की कोमल आयु में ही कैमरे का सम्मुख होकर अपनी अभिनय यात्रा का आरम्भ किया था। बाल कलाकार के रूप में तमिल फ़िल्म 'कंधन करुणई' से अपने अभिनय का परचम लहराते हुए, वह शीघ्र ही दक्षिण भारतीय सिनेमा की चहेती बाल कलाकार बन गईं। इतनी अल्पायु में संवादों को कंठस्थ करना, भावों की सूक्ष्मता को प्रकट करना और कैमरे के समक्ष सहजता बनाए रखना कोई सामान्य कार्य नहीं था; परन्तु श्रीदेवी के लिए तो यह मानो ईश्वर प्रदत्त, स्वाभाविक प्रतिभा ही थी।
एक अनसुनी बात : ----- 
बाल कलाकार के रूप में श्रीदेवी के विभिन्न रूप
यह सर्वविदित है कि श्रीदेवी ने अपनी अभिनय यात्रा का शुभारंभ बाल्यकाल में ही कर दिया था, परंतु यह एक रहस्य ही रहा कि उन्होंने अपने बचपन का बहुमूल्य समय विद्यालय की चौखटों से अधिक चलचित्र के प्रांगणों में व्यतीत किया। निरंतर छायांकन के व्यस्त चक्र ने उनकी औपचारिक शिक्षा को सीमित कर दिया, किंतु अभिनय का क्षेत्र ही उनका अनमोल विश्वविद्यालय बन गया।

विविध भाषाओं, संस्कृतियों और दृष्टिकारों के संग कार्य करते हुए अर्जित उनका अनुभव ही, वह आधारशिला सिद्ध हुआ जिसने उन्हें भारतीय सिनेमा के फलक पर एक अनुपम और परिपक्व अभिनेत्री के रूप में प्रतिष्ठित किया।
किशोर उम्र में बड़ी चुनौती : ----

तेरह वर्षीय श्रीदेवी

मात्र तेरह बरस की कोमल आयु में ही, श्रीदेवी ने तमिल सिनेमा की कालजयी कृति "मून्द्रु मुडिचु" में एक ऐसा जीवंत पात्र गढ़ा, जिसने समस्त दक्षिण भारतीय फिल्म जगत का ध्यान अपनी ओर मोह लिया। इस उत्कृष्ट कृति में, उन्होंने अपने से कहीं अधिक अनुभवी कलाकारों के संग, अपनी परिपक्वता का ऐसा अद्भुत प्रदर्शन किया कि दर्शक मंत्रमुग्ध रह गए।
इससे भी अधिक रोचक तथ्य यह है कि उन्होंने इस फिल्म में रजनीकांत के सौतेले माँ के समान संबंध वाले किरदार को निभाया, जो उस समय के लिए एक अत्यंत साहसी चुनाव था। इतनी अल्पायु में ऐसे गहन और चुनौतीपूर्ण चरित्र का निर्वहन करना, उस दौर की किसी भी नवोदित अभिनेत्री के लिए एक असाधारण उपलब्धि से कम नहीं था, जिसने भविष्य की एक महान नायिका की नींव रखी।
दक्षिण भारत से बॉलीवुड तक : ----
दक्षिण की चार भाषाओं - तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ - में अपनी प्रतिभा का परचम लहराने के बाद, श्रीदेवी ने हिंदी सिनेमा के विशाल सागर में अपनी नाव खेने का निर्णय लिया। यह यात्रा आरंभ में कांटों भरी थी। हिन्दी भाषा पर उनकी पकड़ उतनी मज़बूत न थी, जिसके चलते
उनकी शुरुआती कुछ फिल्मों में उनकी आवाज़ को किसी और की आवाज़ का श्रृंगार पहनाना पड़ा। परन्तु, श्रीदेवी ने इस बाधा को अपने पथ का रोड़ा नहीं बनने दिया। उन्होंने लगन से हिन्दी सीखी, अपने उच्चारण को तराशा और कुछ ही वर्षों में अपनी अधिकांश फिल्मों की आवाज़ स्वयं बनने लगीं। यही तो उनका अनुपम गुण था - वे अपनी हर दुर्बलता को अथक परिश्रम से अपनी सबसे बड़ी शक्ति में परिवर्तित कर लेती थीं। जब बॉलीवुड को मिली अपनी पहली महिला सुपरस्टार : ---- दक्षिण भारतीय सिनेमा में अपनी प्रतिभा का डंका बजाने के पश्चात्, श्रीदेवी ने हिंदी सिनेमा के विशाल फलक पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यद्यपि, यह यात्रा, जैसा कि आज प्रतीत होता है, उतनी सुगम न थी। उस काल में, हिंदी फिल्मों की दुनिया पर हेमा मालिनी, रेखा, जया प्रदा, राखी और ज़ीनत अमान जैसी दिग्गज अभिनेत्रियों का साम्राज्य छाया हुआ था। ऐसे प्रतिष्ठित माहौल में, दक्षिण की धरा से आई एक नवोदित अभिनेत्री के लिए अपनी विशिष्ट पहचान बनाना, वास्तव में, एक दुर्जेय चुनौती से कम न था। आरंभ में श्रीदेवी ने कुछ हिंदी फिल्मों में अभिनय का जौहर दिखाया, किंतु वे वैसी ख्याति न पा सकीं जिसकी अभिलाषा थी। भाषा भी एक विकट बाधा बनकर खड़ी थी। उनकी हिंदी में वह सहजता न थी, जिसके चलते उनकी आवाज़ को कई प्रारंभिक फिल्मों में अन्य कलाकारों द्वारा dubbing का सहारा लेना पड़ा। श्रीदेवी उन अदम्य आत्माओं में से थीं जो विपदाओं के समक्ष घुटने नहीं टेकतीं। उन्होंने अथक प्रयास से हिंदी सीखी, अपने संवादों का निरंतर अभ्यास किया और धीरे-धीरे भाषा पर ऐसी महारत हासिल कर ली कि कालान्तर में उन्होंने अपनी अनेक फिल्मों में स्वयं स्वर दिया। यह उनकी अविचल निष्ठा और ज्ञानार्जन की प्यास का जीवंत प्रमाण था।फिल्म हिम्मतवाला' ने बदल दी किस्मत :----- 
फिल्म " हिम्मतवाला " का पोस्टर
वर्ष 1983 में अवतरित हुई 'हिम्मतवाला', श्रीदेवी के अभिनय-जीवन का एक ऐसा मील का पत्थर सिद्ध हुई जिसने सब कुछ बदल दिया। जितेंद्र के संग उनकी जोड़ी ने दर्शकों के हृदय में एक विशेष स्थान पाया। फिल्म के सतरंगी गीत, मनमोहक नृत्य-शैली और श्रीदेवी की मोहक आभा ने उन्हें क्षण भर में ही हिंदी सिनेमा की सर्वाधिक चर्चित तारिका के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। फिल्म का अमर गीत "नैनों में सपना" आज भी भारतीय सिनेमा के हृदय में एक विशेष स्थान रखता है। इस धुन पर श्रीदेवी की जीवंत ऊर्जा, मोहक भाव-भंगिमाएँ और मनमोहक नृत्य शैली ने तो मानो दर्शकों को सम्मोहित ही कर दिया था। इस अविस्मरणीय प्रदर्शन के पश्चात, निर्माता-निर्देशक अपनी अगली कृतियों में उन्हें प्रतिष्ठित करने हेतु आतुर रहने लगे। एक अनकही दास्ताँ उस कालखंड में, जहाँ अधिकांश महाकाव्य-सी फिल्मों का यशगान नायक के इर्द-गिर्द ही गूँजता था, वहीं 'हिम्मतवाला' की अभूतपूर्व विजय ने फिल्म वितरकों के मानस पटल पर एक नवकिरण का संचार किया। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि पोस्टर पर श्रीदेवी का मात्र उल्लेख ही दर्शकों को सिनेमा के जादुई संसार में खींच लाने की सामर्थ्य रखता है। उस समय किसी भी अभिनेत्री के लिए यह उपाधि किसी अनमोल रत्न से कम न थी। वस्तुतः, यही वह निर्णायक क्षण था जब फिल्म जगत ने उन्हें केवल एक कुशल अभिनेत्री के रूप में नहीं, अपितु 'बॉक्स ऑफिस की महारथी' के रूप में स्वीकारना आरम्भ किया। जब हर निर्माता की पहली पसंद बनीं :----- 'हिम्मतवाला' की सफलता की इबारत के बाद, मानो कामयाबी की एक अटूट श्रृंखला ही चल पड़ी। 'तोहफा', 'मवाली', 'मकसद', 'मिस्टर इंडिया', 'नगीना', 'चांदनी', 'चालबाज़', 'लम्हे', 'खुदा गवाह' जैसी कालजयी फिल्मों ने तो मानो उनके सितारे को बुलंदियों पर पहुँचा दिया, उनकी लोकप्रियता को एक अनूठी उड़ान दी। श्रीदेवी
की सबसे अनूठी विशेषता यह थी कि हर पटल पर वे एक नव-रूप धारण कर लेती थीं।
कभी वे एक भोली-भाली प्रेयसी के वेश में, कभी एक गूढ़ रहस्यमयी नागिन के
रूप में, कभी एक चंचल हास्य-कलाकार के अंदाज़ में, तो कभी एक गहन भावुकता
से सराबोर पात्र के रूप में जीवंत हो उठती थीं। उनकी यही अद्भुत रंगमंचीय
बहुमुखी प्रतिभा उन्हें अपने युग की अन्य अभिनेत्रियों से कोसों आगे ले
जाती थी।'नगीना' ने बदल दी परंपरा : ---- सन् 1986 में, भारतीय सिनेमा के पटल पर 'नगीना' नामक एक अद्वितीय कृति अवतरित
हुई। जहाँ उस युग की प्रायः सभी रचनाएँ पुरुष नायकों के इर्द-गिर्द बुनी
जाती थीं, वहीं 'नगीना' ने पूर्णतः श्रीदेवी के चरित्र को केंद्र में रखकर
एक नया अध्याय लिखा। फिल्म का कालजयी गीत 'मैं तेरी दुश्मन, दुश्मन तू मेरा' आज भी उनके अभिनय
की अविस्मरणीय गाथाओं में से एक है। श्वेत परिधान में उनका नागिन नृत्य,
भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसे प्रतिष्ठित दृश्य के रूप में अंकित हो
गया है, जिसकी आभा आज भी बनी हुई है। कहा जाता है कि इस गीत के फिल्मांकन के दौरान, श्रीदेवी ने अपने मुखमंडल के हाव-भाव, हस्त मुद्राओं और नयनों की चेष्टाओं पर गहन अभ्यास किया था। निर्देशक की अभिलाषा थी कि दर्शक स्वयं को एक नागिन के प्रतिशोध की कथा का साक्षी पाएं। यही वह अलौकिक कारण है कि आज भी यह दृश्य भारतीय सिनेमा के पटल पर एक अमिट छाप छोड़ता हुआ, अत्यंत प्रभावशाली दृश्यों में गिना जाता है। 'मिस्टर इंडिया' और अमर हो गई 'हवा हवाई' :--- वर्ष 1987 में, 'मिस्टर इंडिया' नामक एक उत्कृष्ट कृति ने सिनेमाई पटल पर दस्तक दी, जिसने श्रीदेवी की ख्याति को न केवल राष्ट्रीय, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचा दिया। यद्यपि अनिल कपूर ने इसमें केंद्रीय भूमिका निभाई, तथापि अनेक दर्शकों के हृदय में, श्रीदेवी ही इस फिल्म की सर्वाधिक स्मरणीय और प्रिय पहचान बनकर उभरीं।
पत्रकार सीमा सोनी के रूप में उनका चरित्र, हास्य, प्रेम और गहरी भावनाओं का एक ऐसा मनमोहक ताना-बाना था, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गया। और फिर, वह अमर गीत 'हवा हवाई'! आज भी यह गीत श्रीदेवी की पहचान का पर्याय है। उनके जीवंत, रंग-बिरंगे परिधानों ने, उनकी बेमिसाल अभिव्यक्ति ने, और उनके अद्भुत नृत्य ने इस गीत को कालजयी बना दिया, जो पीढ़ियों तक गूंजता रहेगा।
इसी फिल्म का 'चार्ली चैप्लिन' से प्रेरित हास्य दृश्य, आज भी अभिनय के विद्यार्थियों हेतु एक उत्कृष्ट मिसाल के रूप में सराहा जाता है। श्रीदेवी की अद्वितीय प्रतिभा का एक ज्वलंत प्रमाण यह था कि वे केवल हाव-भाव और सधे हुए समय-बोध से, बिना किसी अश्लीलता के, दर्शकों को ठहाके लगाने पर विवश कर देती थीं। पर्दे पर चुलबुली, असल जीवन में बेहद शांत : ---- यह जानकर अनेकों को विस्मय होता है कि चंचल और आत्मविश्वासी श्रीदेवी, जो पर्दे पर अपनी आभा बिखेरती थीं, वास्तविक जीवन में तो मानो एक शांत सरोवर सी थीं। फिल्मी महफिलों और सार्वजनिक समारोहों में उनकी वाणी अल्प होती थी, और मीडिया से भी वे मानो दूरी बनाए रखती थीं। उनके कई सह-कलाकारों ने इस बात का ज़िक्र किया है कि जैसे ही कैमरा ऑन होता, मानो उन पर कोई जादुई परत चढ़ जाती हो। जो अभिनेत्री कुछ पल पूर्व तक शांत बैठी होती थी, वही कैमरे की नज़रों के सामने आते ही अपने किरदार में इस कदर समा जाती थी, मानो वह उसी का अंश हो। सचमुच, यही एक महान कलाकार की अमिट पहचान होती है। "Part-2 पढ़ें👉👉👉👉 यह वीडियो देखिये :---
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| फिल्म " हिम्मतवाला " का पोस्टर |
वर्ष 1983 में अवतरित हुई 'हिम्मतवाला', श्रीदेवी के अभिनय-जीवन का एक ऐसा मील का पत्थर सिद्ध हुई जिसने सब कुछ बदल दिया। जितेंद्र के संग उनकी जोड़ी ने दर्शकों के हृदय में एक विशेष स्थान पाया। फिल्म के सतरंगी गीत, मनमोहक नृत्य-शैली और श्रीदेवी की मोहक आभा ने उन्हें क्षण भर में ही हिंदी सिनेमा की सर्वाधिक चर्चित तारिका के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।
पत्रकार सीमा सोनी के रूप में उनका चरित्र, हास्य, प्रेम और गहरी भावनाओं का एक ऐसा मनमोहक ताना-बाना था, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गया। और फिर, वह अमर गीत 'हवा हवाई'! आज भी यह गीत श्रीदेवी की पहचान का पर्याय है। उनके जीवंत, रंग-बिरंगे परिधानों ने, उनकी बेमिसाल अभिव्यक्ति ने, और उनके अद्भुत नृत्य ने इस गीत को कालजयी बना दिया, जो पीढ़ियों तक गूंजता रहेगा।
इसी फिल्म का 'चार्ली चैप्लिन' से प्रेरित हास्य दृश्य, आज भी अभिनय के विद्यार्थियों हेतु एक उत्कृष्ट मिसाल के रूप में सराहा जाता है। श्रीदेवी की अद्वितीय प्रतिभा का एक ज्वलंत प्रमाण यह था कि वे केवल हाव-भाव और सधे हुए समय-बोध से, बिना किसी अश्लीलता के, दर्शकों को ठहाके लगाने पर विवश कर देती थीं।



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