संगीत की दुनिया में अमर हुई आशाजी की आवाज
आशा जी का जीवन परिचय
बॉलीवुड में 11 अप्रैल का वह दिन हिंदी सिनेमा जगत के साथ - साथ संगीत की दुनिया के लिए एक बेचैनी भरी खबर लेकर आया। हिंदी सिने जगत की मशहूर पार्श्वगायिका आशा भोसले जी की अचानक बिगड़ी तबियत के कारण उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराये जाने की खबर जैसे ही सामने आई, वह जंगल की आग की तरह पुरे फिल्म जगत में फ़ैल गई।
हर तरफ बस एक ही चर्चा हो रही थी। कोई कह रहा था - दिल का दौरा पड़ा है, तो कोई कुछ और अंदाज़ा लगा रहा था। हालांकि, पारिवारिक सूत्रों के अनुसार उन्हें अत्याधिक थकान और ह्रदय संक्रमण की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
इस समाचार ने देशभर के उनके चाहनेवालों को बेचैन कर दिया। हर कोई उनकी सलामती के लिए दुआ करने लगे। वहीँ डॉक्टरों की टीम लगातार उनके इलाज में जुटी रही।
आशा जी का निधन : -
लेकिन, रविवार 12 अप्रैल की सुबह जैसे ही टी.वी.चैनलों पर यह समाचार ब्रेकिंग न्यूज़ बनी। पूरा देश स्तब्ध रह गया। 92 वर्ष के आयु के पड़ाव में आशा जी ने हमेशा हमेशा के लिए अपनी आँखें मूँद ली और अपने पीछे छोड़ गई - अनगिनत यादें, अमर गीत और एक खालीपन, जिसे शायद कभी भरा नहीं जा सकेगा।
वैसे तो ! आज का दिन इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गया। एक ऐसी आवाज के खामोश होने के रूप में, जिसने कभी करोड़ों दिलों को धड़कना सिखाया था।
इसी बहाने आईये, उनके जीवन की उस अद्भुत यात्रा को जानने की कोशिश करते है, शायद यही हमारी और बॉलीमिज़ोन की ओर से उन्हें एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
बॉलीवुड गायिका की जीवनी : ---
भारतीय संगीत और हिन्दी सिनेमा जगत में कुछ आवाजें ऐसी रही है, जो समय की सीमाओं को पार कर करते हुए अमर बन जाती है। मशहूर गायिका आशा भोसले जी भी उन्ही महान हस्तियों में से एक थी।
आशाजी की आवाज़ ने न सिर्फ़ पुरानी और नई पीढ़ियों को जोड़ा, बल्कि हर भाव जैसे ख़ुशी, दर्द, प्रेम और जीवन के रंग को अपनी गायकी की प्रतिभा में समेट लिया था। उनके निधन के समाचार ने पूरे देश को गहरे शोक में डुबो दिया है, लेकिन उनकी गीतों की विरासत हमारे दिलों में बरकरार रहेंगी।
प्रारंभिक जीवन और उनका संघर्ष : ---
आशा जी का जन्म महाराष्ट्र के सांगली के एक छोटे से गाँव गोआर में 8 सितम्बर 1933 को पंडित दीनानाथ मंगेशकर एवं शेवंती मंगेशकर के घर हुआ था। वैसे आशा जी का वास्तविक नाम आशालता था। उनका मराठी और कोंकणी परिवार था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक अभिनेता और मराठी संगीत मंच के शास्त्रीय गायक थे।
उनके घर का माहौल पूरी तरह संगीत से भरा हुआ था। आशा जी को बचपन से ही सुरों की पहचान थी, जिससे उन्हें संगीत की प्रारंभिक शिक्षा घर से ही मिली। वे मात्र 9 वर्ष की थी, उसी दौरान उनके पिता का देहांत हो गया।
पिता के देहांत के पश्चात उनका परिवार कोल्हापुर आ गयाऔर वहाँ से पुणे में आ गया परन्तु यहाँ से भी उनका परिवार मुंबई में स्थानांतरित हो गया। उस दौरान उन्होंने और उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर जी ने अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए गायन और फ़िल्मों में अभिनय करना आरम्भ किया था।
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| लता मंगेशकर और 9 वर्षीय आशाजी |
आशा जी के गाने,संगीत में पहला कदम : ----
आशा जी ने अपने करियर की शुरुवात बेहद कम उम्र में की थी। उनका शुरूआती दौर आसान नहीं था। उन्हें छोटे-मोटे गाने मिले और कई बार तो उन्हें नज़र अंदाज़ भी किया गया था। लेकिन उनकी मेहनत और ज़िद ने उन्हें सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ाया।
आखिरकार, आशा जी ने अपना पहला फ़िल्मी गाना 1943 में निर्माता विनायक कर्नाटकी उर्फ़ मास्टर विनायक की मराठी फ़िल्म "माझे बाळ" के लिए "चला चला नव बाळा" संगीतकार दत्ता डावजेकर के संगीत निर्देशन में गाया था। उन्होंने हिन्दी सिनेमा के लिए 1948 में निर्माता हंसराज बहल तथा निर्देशक रविंद्र दवे की फ़िल्म "चुनरिया" में "सावन आया" गीत गाकर हिन्दी फ़िल्म में अपनी शुरुआत की थी।
धीरे-धीरे उनकी आवाज़ ने संगीतकारों का ध्यान आकर्षित किया। आशा जी की खासियत थी, वे हर तरह के गीतों को अपने अंदाज़ में ढाल देना। चाहे वह रोमांटिक गीत हो, कैबरे हो, या ग़ज़ल हर शैली में उन्होंने अपनी पहचान बनाई।
1940 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर 1950 के दशक के प्रारम्भ तक उस दौर की स्थापित गायिकाएँ गीता दत्त, शमशाद बेगम के आलावा लता मंगेशकर जैसी प्रमुख गायिकाओं ने गायन में अपना दबदबा बनाये रखा था।
1950 का दशक आते-आते आशा जी ने हिन्दी फ़िल्मों में अधिकाँश पार्श्व गायिकाओं की तुलना में अधिक गाने गाये थे।
उत्कर्ष का दौर : ----
समय के साथ आशा जी ने संगीत की दुनिया में अपनी एक अलग जगह बना ली। उनकी आवाज़ में जो चंचलता और भावनात्मक गहराई थी, वह उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी। उनकी गायकी में एक ख़ास जादू था, जो सीधे दिल तक पहुँचता था।
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| संगीतकार ओ पी नय्यर ने आशाजी से कई गाने गंवाएँ |
1952-1956 के दौरान संगीतकार ओ.पी.नैय्यर ने आशा जी से कई गाने गंवाए हालांकि उन्हें पहली बार सफलता बी. आर.चोपड़ा की फ़िल्म "नया दौर" [1957] से मिली। उन्होंने मोहम्मद रफ़ी के साथ मिलकर साहिर लुधियानवी द्वारा लिखित गाना 'माँग के साथ तुम्हारा' , 'साथी हाथ बढ़ाना' और 'उड़े जब-जब जुल्फे तेरी' जैसे युगल गीतों ने आशा जी को पहचान दिलाई।
इसके पश्चात उन्होंने फ़िल्म "धूल का फूल" , "गुमराह" [1963] , "वक़्त [1965] ," हमराज़ "[1967] ," आदमी और इंसान "[1969] ," धुंध " [1973] और कई अन्य फ़िल्मों के लिए गीत गाये।
आशा जी ने धीरे-धीरे अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करते हुए सचिन देव बर्मन और रवि जैसे दिग्गज संगीतकारों का संरक्षण प्राप्त किया। 70 के दशक के दौरान आशा जी हिन्दी फ़िल्म अभिनेत्री और विख्यात नर्तकी हेलेन की आवाज़ थी, जिनपर "ओ हसीना जुल्फों वाली" गीत फ़िल्माया गया था। उनके कुछ अन्य लोकप्रिय गानों में "पिया तू अब तो आजा" फ़िल्म थी " कारवां " और "ये मेरा दिल" फ़िल्म "डॉन" शामिल है।
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| फिल्म डॉन और कारवां में हेलेन के गानों को आशा जी ने अपनी आवाज दी |

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