शम्मी कपूर का शुरुआती जीवन और संघर्ष
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| “जब ‘याहू’ की गूंज ने हिंदी सिनेमा के हीरो की परिभाषा बदल दी — शम्मी कपूर।” |
जब कभी हिन्दी सिनेमा के सुनहरे दौर की यादों की सिलवटे खुलने लगती है तो, उन यादों की सिलवटों में शम्मी कपूर का नाम अपने आप आँखों के सामने नाचने लगता है। वह महान अभिनेता, जिसने पर्दे पर आते ही हवा का रुख बदल दिया था। बिखरे बाल, मस्त खुली हंसी, झूमता हुआ उनका अंदाज़ और दिल से निकली अदायगी शम्मी कपूर सिर्फ़ एक अभिनेता नहीं थे, वे एक अहसास भी थे।
शम्मी कपूर का शुरूआती जीवन और संघर्ष:—
मस्त अदायगी के मौला शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 में महाराष्ट्र के मुंबई में हुआ था। उनका वास्तविक नाम शमशेर राजकपूर था। हिन्दी सिनेमा जगत के उस महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के बेटे थे। हिन्दी सिनेमा के दिग्गज कलाकारों के ख़ानदान में जन्मे उनके लिए थियेटर का रास्ता आसान नहीं था, जैसा कि आज के कलाकार संघर्ष से बच निकलते है। उनके पिता पृथ्वीराज कपूर स्वयं चाहते थी कि शम्मी भी थियेटर में संघर्ष करें।
शम्मी कपूर ने अपने संघर्ष की शुरुआत बेहद साधारण भूमिकाओं से की थी। शुरूआती फ़िल्मों में उन्हें बार-बार असफलता का स्वाद चखना पड़ा था। कई बार ऐसा लगा कि यह संघर्षरत कलकार कभी कामयाब नहीं हो पायेगा, लेकिन उनके संघर्ष के पीछे छिपा वह जिद्दी कलाकार हार स्वीकारने वालों में से नहीं था। वैसे तो शम्मी कपूर ने में निर्देशक महेश कौल की फिल्म " जीवन ज्योति " से फिल्मों में डेब्यू किया था।
ऊर्जा, चंचलता और रोमांस का संगम:—
1950 के दशक के आख़िर में शम्मी कपूर ने अपने संघर्ष के साथ अपने अभिनय में ऊर्जा, चंचलता और रोमांस का अनोखा मेल जोड़कर ख़ुद को पूरी तरह बदल लिया।
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| शम्मी कपूर की ऊर्जा, चंचलता और रोमांस के अनोखे मेल की फिल्म का पोस्टर " तुमसा नहीं देखा " |
1957 में नासिर हुसैन द्वारा निर्देशित और शशधर मुखर्जी द्वारा निर्मित फ़िल्म "तुमसा नहीं देखा" शम्मी कपूर के लिए यह फ़िल्म टर्निंग पॉइंट बनी। जैसे "छुपनेवाले सामने आ" , "तुमसा नहीं देखा" और "जवानियाँ ये मस्त मस्त" गीतों में उनका अंदाज़ और उनकी मासूम शरारतों ने उस दौर के युवाओं को दीवाना बना दिया।सुपरहिट फ़िल्में जिन्होंने इतिहास रचा : ---
इसके बाद एक के बाद एक सुपरहिट फ़िल्मों ने शम्मी कपूर के फ़िल्मी करियर में दस्तक देना आरंभ कर दिया, जबकि सुबोध मुखर्जी निर्मित एवं निर्देशित फ़िल्म "जंगली" के "याहू चाहे कोई मुझे जंगली कहे" और "आई आई आ सुकू सुकू" गानों ने शम्मी कपूर को दर्शकों ने अपनी पलकों पर बिठा लिया।
इसके आलावा निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत की फ़िल्म "चाइना टाउन" [1962] , "कश्मीर की कली" [1964] , निर्देशक विजय आनंद की फ़िल्म "तीसरी मंज़िल" [1966] , निर्देशक के. शंकर की फ़िल्म "राजकुमार" [1964] और "जी.पी. सिप्पी द्वारा निर्मित फ़िल्म" ब्रम्हचारी " [1968] इन फ़िल्मों से लोकप्रिय बने शम्मी कपूर ने रोमांस को एक नयी भाषा दी—वह प्यार जो खुलकर हँसता था, गाता था और दिल से महसूस होता था।
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शम्मी कपूर का परिवार : ---
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| ' याहू ' फेम शम्मी कपूर अपनी पहली और दूसरी पत्नी के साथ। |
पृथ्वीराज कपूर और रामशर्नीमेहरा कपूर की तीन सन्तानो में शम्मी कपूर दूसरे क्रमांक पर आते है और शोमैन राजकपूर पहले क्रमांक पर तो सबसे छोटे बेटे शशि कपूर थे। यह तीनो बेटों ने बॉलीवुड के हिन्दी सिनेमा में बहुत लोकप्रियता हासिल की थी।
शम्मी कपूर की पहली पत्नी हिन्दी सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्री गीता बाली थी, जिनसे उन्होंने 1955 में विवाह किया था। उनकी दो संताने है, आदित्य और पुत्री कंचन। लेकिन 1965 में चेचक से गीता बाली का दुखद निधन हो गया। जिसके पश्चात शम्मी कपूर ने 1969 में नीला देवी गोहिल से पुनः विवाह किया था।
शम्मी कपूर बने ट्रेंडस्टार : ---
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| “जब ‘याहू’ गूंजा और पूरा थिएटर झूम उठा – शम्मी कपूर का अंदाज़” |
शम्मी कपूर ने अपने संघर्ष पर विजय हासिल करते हुए स्क्रीन पर अपने अभिनय के द्वारा दर्शकों के दिलों में भी अपनी लोकप्रियता का साम्राज्य स्थापित कर लिया था। दर्शकों की अनगिनत भीड़ उनके पीछे कड़ी हो चुकी थी।
शम्मी कपूर अब सिर्फ़ अभिनेता नहीं थे, वे एक ट्रेंड सेटर बन चुके थे उनके डांस स्टेप्स, खुले बाल, रंगीन कपडे और बेफिक्र मुस्कान ने उनके चहेते दर्शकों को नया अंदाज़ दिया।
"याहू!" कहकर जब वे स्क्रीन पर कूदते थे, तो सिनेमा घरों में सीटियाँ गूंज उठती थी। शम्मी कपूर ही है, जिन्होंने बॉलीवुड में पश्चिमी संगीत और भारतीय भावनाओं का खूबसूरत संगम रचा है। यही कारण है कि आज भी उनकी फ़िल्में नई पीढ़ी को उतनी ही ताज़ा लगती है।
बदलता दौर और परिपक्व भूमिकाएँ : ----
समय के साथ-साथ अपनी "याहू" जैसे डांस और बेफ्रिक्र मुस्कान के साथ लीड हीरो की इमेज फाड़कर ख़ुद को एक नए रूप में ढालने की ओर क़दम बढ़ा दिए। अब समय और बढती आयु को थामे एक अच्छे कैरेक्टर आर्टिस्ट की भूमिकाएँ स्वीकारना आरम्भ कर दिया।  |
| फिल्म " विधाता " और फिल्म " हीरो " की कैरेक्टर भूमिका में शम्मी कपूर |
शम्मी कपूर के बदलाव का हमें तब पता चलता है, जब फ़िल्म "मदर इंडिया" के लोकप्रिय अभिनेता सुनील दत्त द्वारा फ़िल्म "रॉकी" [1981] के आलावा निर्देशक सुभाष घई ने निर्देशित फ़िल्में "विधाता" [1981] , "हीरो" [1983] । इन फ़िल्मों में उनकी विभिन्न कैरेक्टर की भूमिकाओं में देखा है। उन्होंने साबित किया की सच्चा कलाकार उम्र का मोहताज नहीं रहता।
शम्मी कपूर जैसे ट्रेंड सेटर आर्टिस्ट ने अपनी लोकप्रियता को थामे लीड हीरो से कैरेक्टर आर्टिस्ट बनने तक का सफ़र उन्होंने पूरे सम्मान के साथ तय किया।
एक ट्रेंड सेटर के युग का अंत, लेकिन यादें अमर : ---
हिन्दी सिनेमा में ख़ानदान की लोकप्रियता होते हुए भी अपनी राह ख़ुद तलाशते संघर्ष को थामे लोकप्रियता की मंज़िल पर ट्रेंड सेटर, डांसिंग स्टेप्स की मिसाल बने शम्मी कपूर को 7 अगस्त 2011 में मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यह दर्शकों के दिलों में बसने वाला अभिनेता गुर्दे की गंभीर विफलता से पीड़ित हो चूका था।
उनकी हालत गंभीर बनी रही इसी के कारण उन्हें वेंटीलेटर सपोर्ट पर रखा गया था। आख़िर वह काल दिवस आ गया 14 अगस्त 2011 को सुबह-सुबह आयु के 79 वर्ष में उनके जीवन का अस्त हो गया।
लेकिन उनकी हँसी, उनका अंदाज़ और उनकी फ़िल्में आज भी जिन्दा है। वे सिर्फ़ एक अभिनेता नहीं थे, वे बॉलीवुड की आत्मा थे—जो आज भी हर पीढ़ी को मुस्कुराना सिखाते है।
अदाकार शम्मी कपूर ने हमें सिखाया कि ज़िन्दगी को दिल से जियो, खुलकर हँसो और प्यार को कभी शर्म से मत छुपाओ। उनके जैसे कलाकार सदियों में एक बार पैदा होते है। उनकी फ़िल्में आज भी वही जादू बिखेरती है, वही ताज़गी लाती है और वही जज़्बात लाती है। वे चले गए लेकिन उनके गानों में और हमारी यादों में सदा जिन्दा रहेंगे।
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