मन्ना डे: भारतीय संगीत के महान फ़कीर और गायक

 Manna Dey Biography in Hindi

मन्ना डे – संगीत का वो फ़कीर, जिसकी आवाज़ में न केवल राग का माधुर्य था, बल्कि आत्मा की गहराई भी समाई हुई थी।

                                मन्ना डे की जीवन कहानी संगीत का वह फ़कीर

                       बॉलीवुड के संगीत के इतिहास में, कुछ गायकों की आवाज़ें केवल गीतों में ही नहीं, बल्कि धड़कते दिलों में भी बस जाती हैं। ऐसी ही एक अलौकिक आवाज़ थी गायक मन्ना डे की। वे एक ऐसे फनकार थे, जिनकी कला को शब्दों में पिरोना मानो सागर को गागर में समेटने जैसा था। उनके बारे में कहा जाता है कि "मन्ना डे गाते नहीं थे, बल्कि वे रागों को साक्षात जीवन प्रदान करते थे।" मन्ना डे जी की आवाज़ में जहाँ शास्त्रीय संगीत की असीम गहराई थी, वहीं भावनाओं की मधुरता और अभिव्यक्ति की एक अद्भुत, सम्मोहक शक्ति भी थी।

जन्म : ---

                       महामाया और पूर्ण चंद्र डे के बंगाली आँगन में, 1919  के कोलकाता नगर में, प्रबोध चंद्र डे का जन्म हुआ। यह वही नन्हा बालक था, जिसे दुनिया स्नेह से 'मन्ना डे' के नाम से जानेगी। संगीत की धुनें तो उन्हें विरासत में मिली थीं, पर मन्ना दा ने तो उस विरासत को भी अपनी अनूठी प्रतिभा से एक नया आयाम दिया।

                        
उनके चाचा, महान संगीतकार के. सी. डे ने मन्ना डे को संगीत की वह सूक्ष्मता सिखाई, जिसने उनके गायकी के सफ़र को एक अनमोल मोड़ दिया। परन्तु, मन्ना डे की गायन यात्रा केवल विरासत की देन न थी, बल्कि यह तो अथक परिश्रम, अटूट लगन और ईश्वरीय प्रतिभा का ज्वलंत प्रमाण थी।

कृष्ण चंद्र डे [ के. सी. डे ]मन्ना डे के गुरु एवं चाचा 
                                            

संगीत के पहले गुरु - परिवार और परंपरा : -

                    
संगीत की गोद में पले-बढ़े, उनके लिए संगीत केवल एक विरासत नहीं, बल्कि जीवन का स्पंदन था। उनके घर का वातावरण संगीत की साधना में ऐसा रंगा हुआ था, मानो वह दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग हो। उनके चाचा, के. सी. डे, ने उन्हें सुर, राग, ताल की बारीकियों और संगीत की असीम गहराइयों से परिचित कराया। यद्यपि प्रारंभिक काल में उनका मन मुक्केबाजी, कुश्ती और क्रीड़ाओं में भी रमता था, तथापि समय के प्रवाह ने उन्हें संगीत की आत्मा से ऐसे जोड़ा कि वह उनके जीवन का पर्याय बन गया।  महाविद्यालय के उन स्वर्णिम दिनों में, मित्रों के आग्रह ने उन्हें एक अप्रत्याशित मोड़ पर ला खड़ा किया – एक गायन प्रतियोगिता का मंच। यहीं से मन्ना डे ने अपनी प्रतिभा का ऐसा परचम लहराया कि उनके जीवन की दिशा ही परिवर्तित हो गई। श्रोताओं के कानों में पहली बार उस अद्भुत स्वर-लहरी का संस्पर्श हुआ, जिसमें मिठास की कोमलता और संगीत के अनुशासन का सामंजस्य विद्यमान था।

 
मुंबई की ओर कदम—संघर्षों से भरा सफर  : -                           

                                1940 के दशक की संगीत पटल पर के. एल. सहगल, मुकेश और तलत महमूद जैसे दिग्गजों का स्वर्णिम प्रभाव छाया हुआ था। इसी कालखंड में, संगीत के अनमोल सपनों को हृदय में संजोए, मन्ना डे ने कृष्ण चंद्र डे के साथ मुंबई की धरा पर कदम रखा। उस दौर में, अपनी पहचान बनाना किसी अग्निपरीक्षा से कम न था। तथापि, मन्ना डे तो विलक्षण प्रतिभा के धनी थे – वे केवल गाते ही न थे, वे तो गाकर जीते थे, हर सुर में अपनी आत्मा का स्पंदन घोल देते थे।

                                 
सह-गायक के रूप में अपने सुरम्य सफर का आगाज़ करते हुए, मन्ना डे ने संगीत के महारथी शंकर-जयकिशन, अनिल बिस्वास, सलिल चोंधरी, रोशन, एस. डी. बर्मन और नौशाद जैसे दिग्गजों के साथ अपने स्वरों को गूंजायमान किया। इन गुरुओं ने मन्ना डे की अनूठी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें ऐसी रचनाएँ सौंपीं, जिन्होंने उनकी कला को एक नई ऊँचाई दी।

मन्ना डे,एस. डी. बर्मन, नौशाद,अनिल बिस्वास, सलिल चौधरी, रोशन 

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 पहचान की पहली रोशनी—“ऊपर गगन विशाल” : -

                   यद्यपि उन्होंने फिल्मों की दुनिया में अपना सफ़र वर्ष 1942 में आरम्भ किया, तथापि उनकी ख्याति का सूर्य 1950 के दशक में ही उदित हुआ। मन्ना डे के कंठ से निकला फ़िल्म "मशाल" का अमर गीत "ऊपर गगन विशाल" ही वह सुमधुर ध्वनि थी जिसने उनकी आवाज़ को करोड़ों दिलों की धड़कन बना दिया। यह केवल एक गीत न था, अपितु यह एक जीवंत प्रमाण था कि कैसे शास्त्रीय संगीत की गरिमा से ओत-प्रोत रचनाएँ भी जन-जन के हृदय में अपना स्थान बना सकती हैं। 

मन्ना डे – हर रंग में ढल जाने वाली आवाज़ : -

                  मन्ना डे की आवाज़ एक ऐसा इंद्रधनुष थी, जिसमें हर रंग समाया था। वे केवल गायक नहीं, बल्कि संगीत के जादूगर थे, जो गंभीर रागों की ऊँचाइयों से लेकर, चुलबुले कॉमेडी गीतों की सरलता, प्रेम के मधुर नग्मों, विरह की वेदना को बयां करने वाले दर्द भरे तराने, कव्वालियों की लयबद्धता और भजनों की पावनता तक, हर विधा में सहजता से विचरण करते थे। उनकी गायकी हर शैली में ऐसे घुल-मिल जाती थी, मानो हर अंदाज़ उन्हीं के लिए गढ़ा गया हो।                                        

                           क्लासिकल महारत                                         

                            " लागा चुनरी में दाग "

                           "  सुर ना सजे क्या गाऊँ मै "

                            "  पूछो ना कैसे मैंने "

                इन गीतों में उनकी शास्त्रीय पकड़ ऐसी थी कि बड़े-बड़े उस्ताद भी चकित रह जाते थे।     

                         भावनात्मक और रोमांटिक गीत 

                           " ये रात भीगी - भीगी "

                            "  चल अकेला, चल अकेला "      

                            "  तू प्यार का सागर है "

                              कॉमिक मास्टरपीस 

                            "  एक चतुर नार "  

       यह गीत गाते हुए, उन्होंने किशोर कुमार के साथ जो जीवंत अभिनय प्रस्तुत किया, वह आज भी अपने आप में एक अद्वितीय मिसाल है।

  शंकर-जयकिशन, सलिल चौधरी और बर्मन का पसंदीदा स्वर : -

                              मन्ना डे उन विलक्षण गायकों की श्रेणी में सुशोभित होते थे, जिन्हें संगीतकार अपनी दुष्कर रचनाओं के लिए सहर्ष चुनते थे। चाहे सलिल चौधरी के गहन, जटिल स्वर-विन्यास हों, या जयकिशन की मधुर, मनमोहक धुनें - मन्ना डे प्रत्येक परिस्थिति में ऐसे सहजता से ढल जाते थे, मानो वे उसी के लिए सृजित हुए हों।

 भक्ति संगीत—आत्मा तक पहुँचने वाली आवाज़ : - 

                               उनकी भक्ति रचनाएँ आज भी मंदिरों में गूँजती हैं:

                           "  जय रघुनंदन जय सीताराम "

                           "  आओ बच्चे तुम्हे दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की "

                           "   उनका भजन " तू प्यार का सागर है " तो सीधे दिल को छू जानेवाली प्रार्थना बन गया। 

                            कठिन गीतों का बादशाह  : - 

                            फ़िल्मी संगीत के विशाल सागर में, मन्ना डे ने अपनी सुरीली आवाज़ से कई ऐसे गीत गाए, जो अपनी जटिलता के कारण अत्यंत कठिन माने जाते हैं। उदाहरण के लिए —

                                लम्बे आलाप 

                                जटिल तानों की सवारी 

                               उच्च और मध्यम सप्तक में समान नियंत्रण 

                    यह सब मन्ना डे की रोजाना साधना का परिणाम था। 

  सम्मान और उपलब्धियाँ : - 

                                  2005 में  " पद्मभूषण "

                                  1971 में  " पद्मश्री  " 

                                  2007  में  " दादा साहेब फाल्के पुरस्कार "

                                1994   में  " फुकुओका प्राइज बाय गवर्नमेंट ऑफ़ जापान 

                          2011  में  " फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड 

                  यह सम्मान केवल उनके नाम को ही नहीं, बल्कि उनकी कला को भी चिरंजीवी बनाता है, उसे युगों-युगों तक जीवंत रखता है।

जीवन के अंतिम पड़ाव—कला के प्रति समर्पण :- 

                                  सन 2000 के दशक में भी, मंच पर उनकी उपस्थिति का जादू बरकरार रहा। मानो समय का उन पर कोई प्रभाव ही न पड़ा हो, बढ़ती उम्र के बावजूद उनका सुर आज भी उसी दृढ़ता और स्पष्टता के साथ गूंजता रहा। वर्ष 2013 में बेंगलुरु में भले ही उन्होंने अंतिम सांस ली, किंतु उनकी आवाज़—वह तो मानो अमरता का वरदान पा चुकी है, आज भी हमारे कानों में जीवंत है।

मन्ना डे—एक ऐसा अध्याय जो कभी समाप्त नहीं होता  : -

                                     मन्ना डे महज़ एक गायक नहीं, बल्कि एक जीती-जागती संस्था थे। उन्होंने संगीत को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि एक पावन साधना के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनके गीत केवल श्रवण के लिए नहीं, अपितु आत्मा के स्पंदन के लिए थे। आज भी जब 'पूछो ना कैसे मैंने' का वह अलौकिक आलाप कानों में गूँजता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई दिव्य चेतना हृदय से निकलकर ब्रह्मांड की अनंत गहराइयों में विलीन हो रही हो। 

 


              


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